नई दिल्ली: केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे हुए हैं|दिल्ली की कई सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों का आंदोलन आज 35वां दिन है।शीतलहर और घटता तापमान भी किसानों का हौसला नहीं तोड़ सका है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को किसानों को खालिस्तानी और माओवादी कहे जाने पर कड़ा ऐतराज जताया|
किसानों को नक्सल' 'खालिस्तानी और माओवादी' कहे जाने पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि,''ये आरोप किसानों पर किसी के द्वारा नहीं लगाए जाने चाहिए। हम उनके प्रति अपना गहरा सम्मान व्यक्त करते हैं। हमारे किसानों के सम्मान में सिर झुकते हैं। वे हमारे अन्नदाता हैं|
राजनाथ सिंह ने कहा कि,''किसानों के प्रति असंवेदनशील होने का कोई सवाल ही नहीं है। सरकार प्रदर्शन कर रहे किसानों की पीड़ा को समझ रही है|हमारे किसान प्रदर्शन कर रहे हैं और मैं केवल एक ही पीड़ित नहीं हूं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पीड़ित हैं|उन्होंने कहा कि, हमारे सिख भाइयों ने हमेशा भारत की संस्कृति की रक्षा की है। देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उनके योगदान को याद किया जाएगा। उनकी ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं है|
उन्होंने कहा कि,'कुछ ताकतों ने किसानों के बीच कुछ गलतफहमियां पैदा करने की कोशिश की है। हमने कई किसानों से भी बात की है। किसानों से मेरा केवल यही अनुरोध है कि क्लॉज-वार चर्चा की जानी चाहिए और हां ’या 'नहीं’ का जवाब तलाशना नहीं चाहिए। हम समाधान निकलेंगे|
राजनाथ सिंह ने कहा कि,'' किसान कम से कम 2 साल इस कानून को उपयोग करके देखे कि ये कानून कितना उपयोगी है फिर अगर आपको लगता है कि कानून में संशोधन करने की जरूरत है तो हमारी सरकार संशोधन करने के लिए तैयार है और आज भी किसान बातचीत करे, उन्हें लगता है कि इसमें संशोधन की आवश्यकता है तो हम तैयार हैं|
मोदी सरकार के मंत्रियों ने किसानों को नक्सलवाद और माओवाद बताया था| किसानों को आतंकवादी, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े और चीन-पाक एजेंट तक बताया था| केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अगर प्रदर्शन को नक्सलियों और माओवादियों से मुक्त किया जाता है तो हमारे किसान जरूर समझेंगे कि ये कानून उनके और देश के हित में हैं| किसान आंदोलन को लेकर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था| कि,'एक किसान के कुछ नेताओं ने इस आंदोलन को हाइजैक कर लिया है। नक्सल-माओवादी ताक़तें जो वहां हावी हो गई हैं...ऐसे में किसानों को समझना पड़ेगा कि ये आंदोलन उनके हाथ से निकल कर इन माओवादी और नक्सल लोगों के हाथ में चला गया है|