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24 अगस्त 2026

अन्ना किसकी ओर हैं! सात वर्षों में मोदी के शासन में कई निर्णयों से जनता बेजार हुई, लेकिन अन्ना ने करवट भी नहीं बदली: शिवसेना

नई दिल्ली: शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे पर निशाना साधा है और उनके द्वारा अपने प्रस्तावित अनशन को रद्द किए जाने पर तंज कसा है| शिव सेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' मे…

अन्ना किसकी ओर हैं! सात वर्षों में मोदी के शासन में कई निर्णयों से जनता बेजार हुई, लेकिन अन्ना ने करवट भी नहीं बदली: शिवसेना
अन्ना किसकी ओर हैं! सात वर्षों में मोदी के शासन में कई निर्णयों से जनता बेजार हुई, लेकिन अन्ना ने करवट भी नहीं बदली: शिवसेना | फ़ोटो: TVL News

नई दिल्ली: शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे पर निशाना साधा है और उनके द्वारा अपने प्रस्तावित अनशन को रद्द किए जाने पर तंज कसा है| शिव सेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में लिखा है,''अब अन्ना को बताना चाहिए कि वो किसान के साथ हैं या सरकार के साथ हैं? शिवसेना ने कहा,''विगत सात वर्षों में मोदी के शासन में कई निर्णयों से जनता बेजार हुई। लेकिन अन्ना ने करवट भी नहीं बदली, मतलब आंदोलन सिर्फ कांग्रेस के शासन में ही करना है क्या..? अन्ना हजारे किसकी ओर हैं!




शिवसेना ने 'सामना' में लिखा है, ''किसानों की समस्याओं को लेकर अण्णा हजारे ने निर्णायक अनशन का एलान किया है तथा अण्णा अनशन न करें इसलिए महाराष्ट्र के भाजपाई नेता रालेगणसिद्धि में जाकर अण्णा से चर्चा कर रहे थे। यह दृश्य वैसे तो दिलचस्प ही था और वह भी अपेक्षानुसार ही। राज्य के विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय कृषि मंत्री कैलाश चौधरी द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद अण्णा ने अनशन रोक दिया। `




शिवसेना ने सामना' में कहा,''केंद्र सरकार को हमने किसानों से संबंधित 15 मुद्दे दिए हैं। उस पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त की जानेवाली उच्चस्तरीय समिति योग्य निर्णय लेगी, ऐसा मुझे विश्वास है इसलिए मैं अपना अनशन स्थगित कर रहा हूं।’ ऐसा अण्णा ने कहा। अण्णा द्वारा अनशन का अस्त्र बाहर निकालना और बाद में उसे म्यान में डाल देना, ऐसा इससे पहले भी हो चुका है। इसलिए अभी भी हुआ तो इसमें अनपेक्षित जैसा कुछ नहीं था। भाजपा नेताओं द्वारा दिए गए आश्वासन के कारण अण्णा संतुष्ट हो गए होंगे तो यह उनकी समस्या है। किसानों के मामले में दमन का फिलहाल जो चक्र चल रहा है, कृषि कानूनों के कारण जो दहशत पैदा हुई है बुनियादी सवाल उसे लेकर है।




 आगे लिखा है,''इस संदर्भ में एक निर्णायक भूमिका अण्णा अख्तियार कर रहे हैं और उसी दृष्टिकोण से अनशन कर रहे हैं, ऐसा दृश्य निर्माण हुआ था। परंतु अण्णा ने अनशन पीछे ले लिया। इसलिए कृषि कानून को लेकर उनकी निश्चित तौर पर भूमिका क्या है, फिलहाल तो यह अस्पष्ट ही है। किसानों का मुद्दा राष्ट्रीय है। लाखों किसान सिंघु बॉर्डर पर 60 दिन से सरकार से संघर्ष कर रहे हैं। सरकार उनके आंदोलन को कुचलने चली है। गाजीपुर बॉर्डर पर सरकार ने किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। बिजली-पानी, अन्न-रसद आदि की आपूर्ति रोक दी है। मानो किसान अंतर्राष्ट्रीय भगोड़े हैं। मादक पदार्थों के आर्थिक गुनहगार हैं, ऐसा तय करके उनके खिलाफ `लुकआउट’ नोटिस जारी की गई है। यह झकझोरने वाली बात है।




लिखा है,'' अण्णा हजारे का इस घटनाक्रम पर निश्चित तौर पर क्या मत है? असल में अण्णा हजारे जो अनशन करना चाह रहे थे, उसके पीछे का उनका मुख्य मकसद क्या है? कृषि कानून रद्द किए जाएं, ऐसा आंदोलनकारी किसानों का कहना है। अण्णा हजारे का अनशन किसानों को समर्थन देने के लिए था क्या? यह स्पष्ट नहीं हुआ। अण्णा का अनशन उसके लिए होता तो अण्णा को मोदी सरकार के विरोध में खुलकर आना पड़ा होता। रालेगण में जो भाजपा के नेता मनुहार आदि के लिए आए उन्हें ऐसा स्पष्ट शब्दों में कहना पड़ा होता। 



शिवसेना ने कहा,''मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते अण्णा दो बार दिल्ली आए और उन्होंने जोरदार आंदोलन किया।  इस आंदोलन की मशाल में तेल डालने का काम तो भाजपा कर रही थी। लेकिन विगत सात वर्षों में मोदी के शासन में नोटबंदी से लॉकडाउन तक कई निर्णयों से जनता बेजार हुई। लेकिन अण्णा ने करवट भी नहीं बदली, ऐसा आरोप भी होता रहा है। मतलब आंदोलन सिर्फ कांग्रेस के शासन में ही करना है क्या..? बाकी अब रामराज अवतरित हो गया है क्या..? 




शिवसेना ने कहा,''अण्णा पूर्व सैनिक हैं। देश की सीमा पर सैनिकों की स्थिति आज निश्चित तौर पर वैसी है..? चीनी सेना ने हिंदुस्थानी जमीन हथिया ली है। अण्णा जैसे समाज सुधारकों को सरकार से सवाल पूछना चाहिए, यह ऐसा ही मुद्दा है। लेकिन अण्णा आज अकेले पड़ गए हैं। राजनैतिक पार्टियों ने उन्हें समय-समय पर इस्तेमाल किया। इससे अण्णा के शरीर को काफी नुकसान हुआ। अनशन करना व उसे आगे बढ़ाना आसान बात नहीं है। उस पर अण्णा की उम्र को देखते हुए उन्हें जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए। पिछले अनशन का परिणाम अण्णा के शरीर के कई अंगों को भोगना पड़ा था। परंतु अण्णा द्वारा कोई आंदोलन छेड़ना आज भी महत्वपूर्ण ही है। इसलिए तो भाजपा के राज्य से दिल्ली तक की टोली को दौड़ भाग करनी पड़ी।





शिवसेना ने सामना' में कहा,''देश के किसान कृषि कानून के विरोध में मैदान में डट गए हैं और उन्हें अण्णा का समर्थन मिला होता तो किसानों के हाथ की लाठी को बल मिला होता। सरकार ने पहले साजिश रची व गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर हंगामा करवाकर किसानों के आंदोलन को बदनाम किया। अब आंदोलन में पुलिस को घुसाकर दहशत निर्माण की जा रही है। कृषि कानून रद्द नहीं किए तो आत्महत्या करने की चेतावनी किसान नेता राकेश टिकैत ने दी। जिस्म में जान रहने तक आंदोलन से बाहर नहीं निकलेंगे, ऐसा टिकैत व उनके लाखों समर्थक कहते हैं तथा सरकारी पक्ष के विधायक लाठी-डंडे लेकर आंदोलन स्थल पर जाकर दहशत निर्माण करते हैं। इस निर्णायक मौके पर अण्णा की आवश्यकता है। 




शिवसेना ने कहा,''अण्णा द्वारा खुलकर भूमिका अपनाने की जरूरत है। ९०-९५ वर्ष के किसान गाजियाबाद की सीमा पर ताल ठोंककर बैठे हैं, ऐसे बुजुर्ग किसानों को नैतिक बल देने के लिए अब अण्णा को खड़ा रहना चाहिए। रालेगण में बैठकर भाजपाई नेताओं के साथ खेल खेलना अब व्यर्थ है। मौका जंग का ही है व ऐसे युद्ध का तजुर्बा अण्णा इससे पहले ले चुके हैं। युद्ध अब गांव से व मंदिर से नहीं होगा। मैदान में उतरना पड़ेगा। लोकतंत्र, किसानों का आंदोलन, किसानों के स्वाभिमान आदि के संदर्भ में अण्णा को भूमिका अख्तियार करनी ही पड़ेगी। 




शिवसेना ने सामना' में कहा,''रालेगण में बैठकर भाजपाई नेताओं के साथ प्रस्ताव और चर्चा के दौर का क्या लाभ? अण्णा ने पहले अनशन का एलान किया और अब केंद्र सरकार के आश्वासन पर विश्वास रखकर उसे स्थगित कर दिया। यह सब ठीक है परंतु कृषि और किसानी को बर्बाद करनेवाले कृषि कानूनों को लेकर उनकी भूमिका क्या है? इस कानून के विरोध में सिंघु बॉर्डर पर मर-मिटने को तैयार बैठे आंदोलनकारी किसानों को अण्णा का समर्थन है क्या? अण्णा निश्चित तौर पर किसकी ओर से हैं? इन तमाम सवालों का जवाब महाराष्ट्र को तो पता चलने दो।








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यह रिपोर्ट 30 जनवरी 2021 को TVL News पर प्रकाशित हुई और 9 मई 2025 को अपडेट की गई। नई जानकारी मिलने पर खबर को अपडेट किया जाता है।

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