लखनऊ: पारुल सुनिल त्रिपाठी (लेखिका - लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा है, विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर कविता एवं कहानियों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करती रहती है)
पढ़ें---------
महिला - पुरुष,पुरुष - महिला
शब्दों के फेर से कुछ होता है क्या,
प्रेम के बंधन से बढ़कर
कोई बंधन होता है क्या
----------
इन शब्दों के फिर में अगर कुछ वंचित रह गया है तो
वह है प्रेम,
जिससे कभी पुरुष वंचित रह जाता
तो कभी स्त्री वंचित रह जाती है,
लेकिन जब इस प्रेम के बंधन में बंधने को दोनों मजबूर हो जाते है,
लिंग भेद होते हुए भी ,मतभेद से दूर हो जाते है,
----------
बस वही अस्तित्व खत्म होता है हीनता का,
शुरुआत होती है बराबरी की
समान भागीदारी की,
तब न पुरुष स्त्री के अधीन होता है ,
----------
न स्त्री पुरुष के ,
उद्भव होता है एक नई पहल का,
गर पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की हीनता है
तो मातृसत्तात्मक समाज में पुरुष की हीनता हो ,इसमें कोई शक नहीं ,
लेकिन अगर ये हीनता जहा कही भी है,
वहा प्रेम का आधिपत्य अवश्य ही कम है,
क्योंकि प्रेम रूपी अथाह सागर में डूबने के बाद तो ,
----------
हीनता का कोई मोल ही नहीं है,
प्रेम खुद में एक सत्ता है,
जिसमे स्त्री पुरुष दोनों समान भागीदार है,
और हा,सत्ता के लालच में ढोंग हो सकता है,
ऐसा कहना कदाचित गलत नहीं होगा,
प्रेम एक बहुत ही जटिल यथावत सरल कृति है,
इस कृति से वंचित रहना
----------
मानव के आदर्श जीवन को न जी पाने जैसा है,
प्रेम तो उचित जीवन यापन का आधार है,
प्रेम तो निराकार है,
प्रेम तो एक आश्था है ,
जिसके अनुकूल हो जाना ,मनुष्य का अहोभाग्य है,
----------
प्रेम की तो कोई जाति नहीं,
कोई लिंग नहीं,
कोई विरादरी नहीं,
पेशा नहीं,
प्रेम तो निष्पक्ष है,
सापेक्ष है,
प्रेम तो मनुष्य की सदैव बनी रहने वाली कामना है।
लेखिका-पारुल सुनिल त्रिपाठी