''नफरत'': इस दुनिया और इंसान का एक दूसरा सच नफरत है
जो एक साफ़ शीशे की तरह झलकता है
एक इंसान की रगों में खून से भी तेज एक नफरत का रक्त होता है
जो दिखता नहीं मगर सब कुछ ले डूबता है
....
इस सवाल का आज तक नहीं मिला कोई जवाब
कि नफरत कैसे हैं इतना बेकसूर
इतना सब कुछ करने के बाद
कैसे नहीं होता उसका कोई कसूर
....
नफरत कभी लाजमी भी होता हैं
मगर उसके पीछे भी एक काला नफरत छुपा होता है
जो अंत में सब कुछ राख कर देता है
....
नफरत यह कैसा शब्द है
जो एक इंसान को दूसरे इंसान के प्रति फर्क बताता है जताता है
बरसते हुए तमाम बूंदों की तरह इंसानों में भी तमाम नफरते बसी है
बस फर्क इतना है दोनों में
ज़मीन पर बूंदें गिरते ही खूबसूरती आती है और नफरत गिरते ही तबाही आती है
....
क्या है यह नफरत कहां से आया है इसका कोई अता पता भी नहीं है
फिर भी यह एक इंसान के जनो दिल तक कैसे बस जाता है
क्या है इसकी खासियत जो यह हर इंसान के दिल में है
....
बस यह शब्द ही है खासियत
नफरत
नफरत
नफरत
विशाल सिंह, छात्र लखनऊ विश्वविद्यालय